मुल्तफ़ित
गुबार फिरौती लेकर गुमराह करके चाहता है लौटा दे सारे हित
दोनों चश्म भी चकना कर दो ,अंतःकरण से होता रहेगा मुल्तफ़ित
गुरेज करती है तब गला दुखता है लेकिन नहीं गये कभी विपरीत ,
खल हरकतो से वाहन ख़राब कर दो ,ख़राब नहीं होगा ये मुल्तफ़ित
गलीज़ बाते कहने से ,परिणय के बाद भी दुराज होगा नहीं होता साबित ,
हक़ और तख़्त तक पहुचेंगे ज़रूर , प्रोत्साहित करता है ये मुल्तफ़ित
उद्विग्न इतना होना , कारण आसक्त को देना , खिचाव इसलिए हो गया है आवृत,
निश्चय अंतरिम है , मुहर नहीं , श्रम कर लेने दो ,थक हार के छुट जायेगी ये मुल्तफ़ित
पौरुष इतना बड़ा कर दूंगा अपना और बढ़ जायेगी तेरी खुद्दारी और प्रीत ,
तमीज़ गिराने से भी मेरा तर्ज़ वही रहेगा ,सीने में पनाह होगी देख के यही मुल्तफ़ित
काटों के साथ होना सहज है ,ऐसे फूल नहीं टूट सकते त्वरित
गुलाब है कनीज़ नहीं ,जान जाओगी की मुक्ता जैसा है ये मुल्तफ़ित
- गौतम पात्र
गौतम पात्र


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