उज़्व
वपु के दो अहम उज़्व का नाम लूँगा ,
अकल के लगभग निर्देश यही अंजाम देता है ,
बाजू तो जड है , हाथो का नाम लूँगा
क्या क्या कर जाते है हाथ , इस्तमाल तो खूब किया सराहा नहीं
लेकिन अब गिन गिन के इसके फायदों का गुलाम लूँगा
बचपन का धुंधला आईना देखो ,
जो गुज़र गया लेकिन वक्त के साथ भर गया ,
हाथो ने क्या नहीं किया हमारे लिए ,
सोचते सोचते शर्मिदा कर गया ,
एक सहारा दिया था ज़मीन ने ,
एक सहारा दिया था एक और हाथ ने ,
पैर तो कुछ नहीं जानते थे ,
हाथो ने ही खड़ा करना सिखाया गिरते गिरते
चलते चलते पैर हकलाते थे ,
हाथो ने सहारा दिया चलते चलते
हवा का झुला जो हाथ ही उठाकर हसाता था
किसी गेंद से खेलना हो तो हाथ ही दिलवाता था ,
कही बहार अगर टेहेलने चले पिता के साथ ,
वो हाथ पकड़ लेता था ऊँगली , इसी तरह ध्यान रखता था
कलम का तौर तरीका भी इन्ही हाथो की उंगलियों ने जाना ,
अक्षर जब ठीक से नहीं बनते थे , तो हाथो से अभ्यास किया ना ,
नज़रे पढ़ते पढ़ते भूल गयी कौनसी लाइन पे थे ,
लेकिन जब भी ऊँगली रखी लाईन याद हुआ ना ,
रोटियों को दातो के गुफा में भी ये हाथ ही पहुचाते है ,
कुछ खोलना हो या बंद करना हो , हाथ ही कर पाते है ,
एक तमाचा भी लग जाता है , बड़ी बड़ी उँगलियाँ भी उठ जाती है ,
यही हाथ किसी और के गले भी लग जाते है और गला दबा भी देते है
झूठा खाया पर हाथो ने उठाया ,
झूठा खाया पर हाथो से पोछा ,
घर में झाड़ू भी लगता है और लगता है पोछा,
खाना पकाना हो या नमक चखना हो ,
कूड़ा उठाना हो या पैसा लौटाना हो ,
दस्तखत करने हो या अंगूठा लगवाना हो ,
सीडी पकडनी हो या लिफ्ट का बटन दबाना हो
ये हाथ हमेशा काम करती रहती है
कपडे धोती है , इस्त्री करती है ,
टीवी का रिमोट चालू करती है ,
बिस्तर बनाती है ,
कई सामन उठाती है
भगवान् के सामने भक्ति हाथ जोड़कर दिखाती है
यही हाथ बहन की राखी का कवच बनती है ,
कंप्यूटर पर एक एक क्लिक से दुनिया बदलती है ,
ये हाथो का सहारा की बदन ढक जाते है ,
इन हाथो की कारीगरी से तो चित्र से लेकर बड़ी बड़ी मशीने बन जाती है
ऊँची इमारते खड़ी हो जाती है ,
पेड़ो में वक्त वक्त पर उठाकर पानी डालो बड़ी हो जाती है ,
आय निकलकर आती है जब हाथ चलने शुरू होते है ,
इन्साफ भी इन्ही हाथो से लिखे जाते है ,
उठाना , गिराना , निकालना , डालना ,
एक जगह से दुसरी जगह सामन पहुचाना ,
इन हाथो से नेकी भी होती है ,
इन्ही हाथो से दुआ भी होती है ,
रेपरिंग का काम भी इन्ही हाथो से किया जाता है ,
ये हाथ है काफी कुछ साफ़ भी किया जाता है ,
हाथो की कोई कीमत नहीं , ये कुदरत का उपकार है ,
उज़्व तो और भी है कई पर हाथो का हथियार है
- गौतम पात्र
S - 1:13AM
F- 2:28 AM


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